पृथ्वी को बचाना है तो केवल सोशल मीडिया पर मैसेज फारवर्ड करने से काम नहीं चलेगा

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पृथ्वी (earth)! जी हां, आज पृथ्वी दिवस (earth day) है। आपको भी पर्यावरण संरक्षण (environment protection) के खूब संदेश मिले होंगे।
आपने भी इन संदेशों को फारवर्ड (forward) कर दिया होगा, लेकिन क्या इतने मात्र से आपकी हमारी पृथ्वी (earth) बचने वाली है?
उत्तराखंड (uttarakhand) की बात करें तो यहां भारतीय वन सर्वेक्षण (forest survey of India) यानी एफएसआई (FSI) के ताजा सर्वे में राज्य में 30 प्रतिशत फारेस्ट कवर (forest cover) घटने की बात सामने आई है।
पहाड़ पर सड़क चौड़ीकरण में मानकों को ताक पर रखा जा रहा है। मलबा न जाहिर है कि राज्य में विकास (development) के आगे विनाश को चुना जा रहा है। हम पर्यावरण (environment) के खतरे से आंखें चुराए खड़े हैं।
दिल्ली-देहरादून के बीच लगने वाले समय को बचाने के लिए हाल ही में सुप्रीम कोर्ट (supreme court) ने 11 हजार पेड़ों को काटे जाने की हरी झंडी दे दी है।
जहां पहाड़ अभी से तपने लगे हैं, वहां आने वाला समय पर्यावरण के लिहाज से कितना कष्टकारी होने वाला है यह हम अभी नहीं समझ रहे हैं।
होना तो यह चाहिए था कि हम लोग नार्वे (Norway)  से कुछ सीखते। नार्वे, जिसकी कुल आबादी करीब 50 लाख के आस पास है।
उसने वनों के काटे जाने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी है। कमोबेश ऐसा कदम उठाने वाला वह दुनिया का पहला देश है।
पर्यावरण संरक्षण उसकी प्राथमिकता में है और वह दुनिया भर में पृथ्वी (earth) को बचाने के लिए इस तरह की कवायद को फंड भी करता है।
आपको बता दें कि नार्वे में तेल एवं प्राकृतिक गैस (oil and natural gas) के भंडार हैं। इसके बावजूद वह जगह अपनी प्रकृति को लेकर संवेदनशीलता की वजह से गर्म नहीं है। पृथ्वी (earth) के प्रति संवेदनशील है।
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वहीं, आइसलैंड (Iceland) एक छोटी सी जगह है, लेकिन पर्यावरण संरक्षण कैसे किया जा सकता है, यह उसकी हरी भरी बसावट देखकर समझा जा सकता है।
हम विदेशी गाड़ियों, विदेशी सामान के पीछे पागल रहते हैं, लेकिन उनकी अच्छाईयों को नहीं अपनाते। नीदरलैंड (netherland) की राजधानी एम्सटर्डम (Amsterdam) को ही ले लीजिए।
साइकिलिंग (cycling) यहां इस शहर के चरित्र को बयां करने के लिए काफी है। आपको यहां साइकिल लेन मिलेंगी और बड़ी संख्या में लोग शहर में साइकिलों पर चलते नजर आएंगे।
हमारे यहां बहुत से शहरों में साइकिल ट्रैक बनाए तो गए, लेकिन अब उनमें पशु चलते हैं।
लाॅकडाउन (lockdown) में पैशन की तरह नजर आने वाली साइकिल अब फिर से स्टोर में बंद हो चुकी है और प्रदूषण का पर्याय बनी गाड़ियां सड़कों पर हैं।
हमारा भविष्य भी पर्यावरण के लिहाज से धुआं न हो जाए, इससे पहले चेतने की आवश्यकता है। http://khaskhabar24.com
से बातचीत में रक्षा सूत्र आंदोलन के प्रणेता सुरेश भाई (Suresh bhai) भी यही दोहराते हैं।
उनके अनुसार जंगल कटते वक्त वन विभाग केवल बड़े पेड़ों की गिनती करता है। छोटे मोटे पेड़ तो साथ में कट जाते हैं।
वह चाहते हैं कि जो लोग अपने स्तर से पेड़ कटने का विरोध कर रहे हैं, इसे और तेज किया जाना चाहिए। गंगोत्री (Gangotri) में सड़क चौड़ीकरण के लिए जद में आ रहे देवदारों के कटान पर भी वे मुखर हैं।

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