‘महाभोज’ 40 साल बाद भी मौजूं, उजागर करता है नेताओं का मंत्र-जनता को बाँट कर रखो…

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समय के अलग-अलग टुक़डों को  जोड़ दें तो ‘महाभोज’ (mahabhoj) 8 घंटे में पूरा हुआ। जी हां, महाभोज! मशहूर लेखिका मन्नू भंडारी की कृति।

‘आपका बंटी’ (apka bunty) के बाद उनकी ये दूसरी किताब पढ़ी थी‌। जब से इस  उपन्यास को खत्म किया, ऐसा लग रहा है जैसे अपने भीतर कोई गर्भ लेकर घूमता है।

इस प्रसव से मुक्ति का एक ही उपाय था-इसके बारे में लिखना। ‘महाभोज’ (mahabhoj) को जब से पढ़ना किया, तभी से उसके लफ्जों की रवानी नसों में है।

यदि आप इसे केवल उपन्यास की तरह पढना चाहते हैं तो इसे हाथ भी न लगाइए। महाभोज (mahabhoj) महसूस करने और आत्मसात करने के लिए लिखी गयी कृति है।

शीर्षक देखकर लगा कि इसमें किसी वृहद भोज का जिक्र होगा। पर यह क्या? पहला पन्ना पलटते ही बिसेसर उर्फ़ बिसू की हत्या का चित्रण था‌।

पन्ना दर पन्ना ‘महाभोज’ अपराध और राजनीति के गठजोड़ का यथार्थवादी चित्रण था। करीब चार दशक पहले लिखे इस उपन्यास का एक-एक वाक्य तत्कालीन राजनैतिक और सामाजिक हालात की हकीकत बयाँ कर रहा था। आज भी तो कुछ भी नहीं बदला।

मन्नू अपनी इस कृति  में पाठकों को  सामाजिक परिवेश, वर्ग संघर्ष और मुफलिसी में जीने के लिए मजबूर लोगों की दशा देखने का एक झरोखा देती हैं।

मनसा-वाचा-कर्मणा के गांधीवादी दर्शन का लबादा ओढ़े हुए दा साहब (da sahab) जैसे लोग और राजनीति के खोखले आदर्शों, कुर्सी की लोलुपता के साथ ही दोगली पत्रकारिता, अवसरवादी पुलिस तंत्र के चरित्र को  पाठकों के बीच सजीव परोसते हैं।

इस उपन्यास के केंद्र में है सरोहा गाँव। वहां विधानसभा चुनाव होना  है। कहानी शुरू होती है पुल के पास पड़ी बिसेसर उर्फ़ बिसू की लाश से। यह आत्महत्या है या हत्या? यह सिद्ध होना बाकी है।

बिसेसर गाँव हरिजनों के टोले में लगी आग और उसमे हुई दर्जनों निर्मम हत्याओं के पुख्ता प्रमाण को लेकर दिल्ली जाने की तैयारी में होता है, ताकि बस्ती के लोगों  को न्याय मिल सके।

इस काम में उसका साथी है उसका दोस्त बिंदेश्वरी उर्फ़ बिंदा। पर इससे पहले कि वह दिल्ली पहुँचता उसका शव गाँव की पुलिया पर मिलता है।

शुरुवात में दा साहब आदर्शवादी, नियम के पक्के और  गांधीवादी विचारों के वाहक नजर आते हैं। पर जैसे-जैसे कहानी 135वें पन्ने से  आगे का सफ़र तय करती है, मन दा साहब के प्रति घृणा से भर जाता है।

उनकी असलियत सामने आने लगती है। सत्ता की लोलुपता के चलते जोरावर के साथ षडयंत्र कर विसेसर को चाय में जहर दे कर मरवा दिया जाता है।

उधर, बिसू की मौत के बाद उसका साथी बिंदा इस प्रतिरोध को ज़िंदा रखता है पर राजनीति क्या न करवाए?

बेकसूर बिंदा को अंततः बिसू की हत्या के आरोप में फँसा दिया जाता है। जांचकर्ता सक्सेना सस्पेंड कर दिए जाते हैं।

लोचन पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्तता के आरोप के चलते मंत्रिमंडल और पार्टी से निकाल दिए जाते हैं।

इस उपन्यास के विलेन बनकर उभरते हैं  दा साहब, जिनके इशारों पर यह सब खेल रचा गया। आज भी समाज में  दा साहब जैसे अनेक लोग हैं,  जो देश को दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं।

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उपन्यास में एक जगह मन्नू एक वाक्य  लिखकर पाठकों के चिन्तन के लिए छोड़ देती है कि….

“जनता को बाँट कर रखो… कभी जात की दीवारें खींचकर, तो कभी वर्ग की दीवारें खींचकर। जनता का बँटा- बिखरापन ही तो स्वार्थी राजनेताओं की शक्ति का स्रोत है।”

लेखक-संजय नौटियाल।

(बीते करीब दो दशकों से शिक्षा के क्षेत्र से नाता है। इस वक्त अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन-पौड़ी जनपद में शिक्षक शिक्षा (teacher education) के बतौर कार्यरत हैं)

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