किसान कृषि कानून वापसी पर डटे, सरकार बोली-पहले के प्रस्ताव पर ही विचार का विकल्प

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केंद्र और किसानों के बीच 11वें दौर की वार्ता का भी कोई नतीजा नहीं निकला है। सरकार ने किसान (farmer) संगठनों से पूर्व प्रस्ताव पर ही विचार को कहा है।

उसकी ओर से कोई नया कोई प्रस्ताव नहीं दिया गया है।  10 दौर की वार्ता के बाद 22 जनवरी को 11वें दौर की बातचीत किसान (farmer) संगठनों के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच विज्ञान भवन (vigyan bhawan) में हुई।

इसमें भी पुरानी बातों को ही दोहराया गया। इधर, सरकार कृषि कानूनों (agriculture laws) को लेकर अपने कदम पीछे हटाने को तैयार नहीं हैं।

वही, किसान तीनों कृषि कानूनों वापस लिए जाने से कम किसी बात पर भी समझौता करने को तैयार नहीं।

Farmer संगठनों के प्रतिनिधि दिल्ली बार्डर पर अलग-अलग गतिविधियों में बिता रहे समय।
Farmer संगठनों के प्रतिनिधि दिल्ली बार्डर पर अलग-अलग गतिविधियों में बिता रहे समय।

सरकार पिछली बैठक में कृषि कानूनों को डेढ़ साल के लिए अस्थायी रूप से निलंबित करने की बात कह चुकी है।

लेकिन किसानों का तर्क है कि जो कृषि कानून आज हानिकारक हैं, वे डेढ़ साल बाद भी हानिकारक ही रहेंगे। ऐसे में सरकार के इस प्रस्ताव का कोई औचित्य नहीं है।

उनकी सीधी सी मांग है कि सरकार इन कानूनों को वापस ले। उनका सरकार पर संवेदनहीनता का आरोप है तो वहीं सरकार उन पर हठधर्मिता का आरोप लगा रही है।

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर साफ कर चुके हैं कि कानून वापस नहीं होंगे। फिलहाल सारा मामला जस का तस पर ठहरा है।

उधर, किसानों का आंदोलन सिंघु बार्डर (singhu border) समेत दिल्ली के अन्य बॉर्डर पर पूर्ववत जारी है।

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कड़कड़ाती ठंड, कोहरे और मौसम के तमाम विपरीत हालात के बावजूद किसान अपने तंबुओं में जमे हुए हैं। वे तरह तरह की गतिविधियों में वहां समय बिता रहे हैं।

लंगर चल रहा है और कोई भी इसमें शामिल होकर पेट भर सकता है। तमाम संगठनों से आंदोलन में जुटे किसानों तक सहायता पहुंच रही है।

किसान भी अपनी लड़ाई पूरी होने तक मैदान से पीछे न हटने का ऐलान कर चुके हैं। वे गणतंत्र दिवस यानी 26 जनवरी की प्रस्तावित रैली के लिए दृढ़ संकल्प किए हुए हैं।

 

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