कुंजापुरी देवी मंदिर : जहां होता है आस्था और प्रकृति का अनोखा संगम

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यदि आप ऋषिकेश घूमने आए हैं तो कुंजापुरी देवी (kunjapuri devi) मंदिर भी जा सकते हैं। यह मंदिर ऋषिकेश से केवल करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित है।

समुद्र तल से लगभग 1676 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह कुंजापुरी देवी (kunjapuri devi) मंदिर एक पौराणिक एवं पवित्र सिद्ध पीठ के रूप में जाना जाता है |

इस जगह से गढ़वाल (garhwal) की हिमालयी चोटियों के दर्शन होते हैं। स्वर्गारोहिणी, गंगोत्री, बंदरपूँछ, चौखंबा और भागीरथी घाटी के भी नजारे दिखते हैं ।

कुंजापुरी देवी (kunjapuri devi) मंदिर टिहरी (tehri) गढ़वाल जिले में पड़ता है। यह नरेंद्र नगर-चंबा (Narendra nagar-chamba) रोड पर नरेंद्र नगर से महज 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

हिंडोला खाल के हरे-भरे जंगलों के बीच सर्पीली सड़क से गुजरते हुए यहां की खूबसूरती देखते ही बनती है। सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा बेहद खूबसूरत होता है।

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मंदिर के द्वार सुबह छह बजे खुल जाते हैं। यहां आने वाले भक्त मंदिर परिसर में सेल्फी भी लेते हैं।

सबसे अच्छी बात तो यह है कि यहां साल में किसी भी समय जाया जा सकता है। नवरात्र के समय यहां भारी भीड़ रहती है।

अब आपको कुंजापुरी देवी (kunjapuri devi) मंदिर के इतिहास के बारे में बताते हैं। यह
देवी दुर्गा का मंदिर है।

शिवालिक रेंज (shivalik range) में स्थित तेरह शक्ति पीठों में से एक है। बताया जाता है कि इस मंदिर को जगदगुरु शंकराचार्य ने स्थापित किया था।

आपको बता दें कि शक्ति पीठ उन जगहों पर हैं, जहां भगवान् शिव (lord Shiva) के द्वारा  हिमालय की ओर ले जा रहे देवी सती (भगवान् शिव की पत्नी एवं राजा दक्ष की पुत्री) के मृत शरीर के अंग गिरे थे |

बताया जाता है कि देवी सती के पिता राजा दक्ष के भगवान शिव के बारे में अपमानजनक बातें कहने पर क्रोधित सती यज्ञ कुण्ड में जल गई थीं।

जब भगवान शिव को सती की मृत्यु का पता चला तो वे शोकाकुल हो गए और सटी के पार्थिव शरीर को लेकर हिमालय की ओर निकल पड़े।

शिव की उदासीनता को भंग करने और सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान् विष्णु ने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया, जिससे सती के अंग विभिन्न पहाड़ियों पर गिर गए। कुंजापुरी दुर्गा मंदिर हजारों भक्तों की आस्था का केंद्र है।

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